मंगलवार, 31 जनवरी 2012

मतदान की आंधी में मुद्दे

अरुण कुमार त्रिपाठी

सोमवार को पंजाब और उत्तराखंड और उससे पहले मणिपुर में जिस तरह मतदान की आंधी चली है उसे देखकर यही लगता है कि इस देश की जनता की दीवानी है और उस दीवानगी को बढ़ाने में राजनीतिक दलों के साथ भगवान भी लगे हुए हैं। अगर एेसा न होता तो बुरे मौसम के कारण चुनाव प्रचार को बाधित करने वाले उत्तराखंड में चुनाव के दिन धूप न खिली होती। पर इन चुनावों में हमेशा की भांति जिस तरह राजनीतिक दल मूल मुद्दों के भटकते रहे हैं उससे लगता है कि वे जनता की इसी दीवानगी का फायदा उठाते रहते हैं। इससे यह भी लगता है कि जनता मतदान को ही लोकतंत्र समझ कर उसके नशे में झूम रही है और राजनीतिक दल और उसे चलाने वाला कारपोरेट तंत्र उसे छलते हुए धन और सत्ता के मजे लूट रहा है। या फिर इसका मतलब यह भी हो सकता है कि जो जनता कुछ महीने पहले बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के साथ देश की मौजूदा राजनीति के प्रति अरुचि दिखाते हुए उसे बदलने को आतुर थी वह उसी को मजबूत करने को आतुर है। वही मणिपुर जहां पिछले दो महीनों तक नाकेबंदी चली और पूरे राज्य में हाहाकार मच गया था और वही राज्य जहां सश बल विशेष अधिकार अधिनियम को समाप्त करने के लिए इतना लंबा आंदोलन चल रहा है, वहां इसी लोकतंत्र में आस्था जताते हुए 82 प्रतिशत मतदान हुआ। इसी तरह वह पंजाब जहां कांग्रेस और अकाली दल दोनों पार्टियों पर भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार के अपने-अपने ढंग के आरोप चल रहे थे, वहां की जनता ने 77 प्रतिशत मतदान किया। दिलचस्प बात यह है कि पंजाब के उस मालवा इलाके में जहां किसानों और मजदूरों ने सबसे ज्यादा आत्महत्याएं की हैं भारी मतदान हुए। संगरूर जिले में 80 प्रतिशत मतदान और मुक्तसर में 84 प्रतिशत मतदान तक मतदान हुआ है। उससे भी रोचक तथ्य यह है कि मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के चुनाव क्षेत्र लांबी में 86 प्रतिशत और मनप्रीत सिंह बादल के चुनाव क्षेत्र गिद्दरवाह में 88 प्रतिशत तक मतदान हुआ है। उसके विपरीत जीत और मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के क्षेत्र पटियाला शहर में ‘महज 73 प्रतिशत मतदान हुआ है। उधर उत्तराखंड में हुआ 70 प्रतिशत मतदान एक दशक का सबसे ज्यादा मतदान है।


इन मतदानों के बाद राजनीतिक दल इसकी अपने-अपने ढंग से व्याख्या कर रहे हैं। सत्तारूढ़ पार्टियों का दावा है कि यह तो उसे फिर से सत्ता में लौटाने के लिए हुआ मतदान है और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने कहा भी है कि उन्हें 80 सीटें मिलेंगी। दूसरी तरफ विपक्षी दलों का कहना है कि यह सत्ता विरोधी मतदान की आंधी है। जनता शासक दलों के नाकारापन और भ्रष्टाचार से ऊबी हुई है। इसलिए यह वोट उन्हें सत्ता से हटाने के लिए पड़े हैं। लेकिन उत्तराखंड और पंजाब दोनों में शासक और विपक्षी दलों के बीच बराबरी का टक्कर बताने वाले भी कम विश्लेषक नहीं हैं। जाहिर है परिणाम तो छह मार्च को ही सामने आएंगे लेकिन एक जो सबसे बड़ा परिणाम आया है वह लोकतंत्र के प्रति आस्था और रुचि का। इस देश में जब-जब लोकतंत्र से ऊबने और उसके नाकाम होने का हल्ला मचता है, तब-तब जनता उसमें डूब कर आस्था व्यक्त करती है। इसलिए यह दावा करने वाले भी खूब हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन फुस्स हो गया। एक तरफ भारतीय संसद ने भ्रष्टाचार विरोधी कानून को खारिज कर दिया तो दूसरी तरफ जनता ने भी उन्हीं पार्टियों के तंत्र में ज्यादा रुचि दिखाई जिन्होंने उसे पास नहीं होने दिया। अन्ना आंदोलन जिस प्रकार कांग्रेस पार्टी को निशाना बना रहा था (हालांकि निशाना बनाने लायक आचरण भाजपा सहित अन्य क्षेत्रीय दलों का भी पर्याप्त था) उसके होते हुए अगर चार राज्यों में कांग्रेस सत्ता में आ गई और उत्तर प्रदेश में उसकी सीटें बढ़ गईं तो अन्ना आंदोलन का क्या अर्थ रह जाएगा? या रामदेव का ही क्या मतलब होगा?
मामला भ्रष्टाचार का ही नहीं लोगों के अस्तित्व और जीवन का भी है। समस्याएं उत्तर प्रदेश जसे पिछड़े राज्य की ही नहीं हैं, समस्याएं पंजाब जसे अगड़े राज्य की भी गंभीर हैं। पंजाब की अर्थव्यवस्था ठहरी हुई है। बेरोजगारी बढ़ी है। आज वहां कोई निवेशक आने को तैयार नहीं है। दूसरी तरफ नशे की गिरफ्त में फंसे युवाओं की पीड़ा अलग है। इसके उदाहरण के तौर पर पंजाब के चार गांव बलरां, जज्जर, हरकिशनपुर, मलसिंह वाला हैं। पंजाब के इन गांवों ने अगर हरित क्रांति का सुख भोगा है तो अब वे उसके अभिशाप को ङोलने को विवश हैं। संगरूर जिले के बलरां गांव में 85 आत्महत्याएं हो चुकी हैं। उसी तरह हरकिशनपुर एेसा गांव है जहां कभी लोगों ने बोर्ड लगा दिया था कि यह गांव बिकाऊ है। जज्जर और मल¨सहवाला गांव रासायनिक खादों और कीटनाशकों का जहर ङोल रहे हैं। वहां कई लोगों का मौतें हो चुकी हैं और दर्जनों अपाहिज हो चुके हैं। लोग कैंसर से पीड़ित हैं। विडंबना देखिए कि राजनीतिक दल खेती के तरीके में बुिनयादी परिवर्तन करने के बजाय महज मुफ्त बिजली देने और कुछ दूसरे किस्म की राहत देने का वादा करके चल देते हैं। वे उस प्रणाली का विकल्प ढूंढने की बात बिल्कुल नहीं करते जिसके चलते यह स्थितियां आई हैं।
एेसी ही चिंताजनक स्थितियां उत्तराखंड में हैं। वहां उत्तराखंड क्रांतिदल जसी जिन पार्टियों ने अलग राज्य के लिए आंदोलन किया उनका अस्तित्व समाप्त हो चुका है। वे या तो राष्ट्रीय दलों में विलीन हो चुकी हैं या फिर मुरझा गई हैं। पर्वतीय राज्य जिस मकसद के लिए बना था वह तो भुला दिया गया और फिर उन्हीं मैदानी इलाकों और तराई में विकास हो रहा है जिनके नाते पहाड़ उजड़ रहे थे। देहरादून, हरिद्वार और नैनीताल के तराई वाले इलाके की आबादी 20 प्रतिशत के करीब बढ़ी है वहीं अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ जसे जिलों की आबादी घट रही है।
दिलचस्प बात यह है कि सभी राजनीतिक दलों ने अपने-अपने घोषणा पत्रों और दृष्टिपत्रों में विकास का दावा किया है लेकिन उसके लिए वे कौन सा नजरिया अपनाएंगे यह साफ नहीं है। उत्तर प्रदेश के विखंडन को मुख्यमंत्री मायावती ने एक चुनावी मुद्दा बनाकर उछाला था। वह मुद्दा इस चुनाव की आंधी में बह गया है। किसी अन्य दल को तो छोड़िए बसपा भी उन पर चर्चा नहीं कर रही है। उसके कार्यकर्ताओं को यह डर सता रहा है कि कहीं प्रदेश बंट जाने से बहनजी की हैसियत कम न हो जाए। उधर भट्टा परसौल और टप्पल के किसानों का कहना है कि कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने उनके मुद्दों को उठाकर वाहवाही तो खूब लूटी लेकिन उनके लिए कुछ किया नहीं। बल्कि उन्होंने उनका इस्तेमाल किया।
सवाल उठता है कि क्या भारी मतदान की आंधी में जनता के मुद्दे उड़ गए? या वे छह मार्च को किसी नए रूप में प्रकट होने का इंतजार कर रहे हैं? या हमारा लोकतंत्र मुद्दों को हल करने के बजाय चलती का नाम गाड़ी बन कर गया है और उसमें समाधान के लिए उसके समांतर सतत प्रयास जरूरी है?

रविवार, 29 जनवरी 2012

कागजों में सिमटा है गणतंत्र

सुनील गंगोपाध्याय

जिस संविधान को अंगीकार किए जाने की खुशी में हम भारत के नागरिक गणतंत्र दिवस मनाते हैं आज उसी के मूल्यों को ताक पर रख दिया गया है। समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व यानी समाजवाद के जिन मूल्यों को स्थापित करने और जिनकी रक्षा करने का संकल्प इस गणतंत्र में किया गया है, वे सभी तार-तार हो रहे हैं। लेखकीय स्वतंत्रता को कुचले जाने का नमूना जयपुर साहित्य सम्मेलन में दिखाई दिया, तो देश की बड़ी आबादी की बदहाली हमारे समता संबंधी दावों की रोज कलई खोलती है। दंगे और वैमनस्यता हमारी धर्मनिरपेक्षता औ्र बंधुत्व को खंडित करते हैं। एेसे में लोकतंत्र एक दस्तावेज से बाहर निकाल कर साकार करने की जरूरत है।

भारत में गणतंत्र लागू किए हुए भले ही 62 साल बीत गए हैं, लेकिन मुङो लगता है कि यह व्यवस्था सिर्फ कागजों तक ही सीमित होकर रह गई है। कम से कम हमारे आसपास जो कुछ हो रहा है, उससे तो यही लगता है कि हमारा देश चंद राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के हाथों में गिरवी है।
ताजा घटना जयपुर में देखने को मिली है, जब सारी तैयारियों के बाद सलमान रुश्दी को साहित्य उत्सव में भाग नहीं लेने दिया गया। यहां तक रुश्दी की आवाज को इस कदर दबाने की कोशिश की गई कि उनके वीडियो कांफ्रेंसिंग को भी प्रतिबंधित कर दिया गया, जिसके माध्यम से वह अपने प्रशंसकों को संबोधित करना चाहते थे। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर इस तरह की हरकत अपने आप में शर्मनाक घटना है। हमारा गणतंत्र हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है, लेकिन असलियत में ऐसा कुछ दिखाई नहीं देता, जिससे यह साबित हो सके। अगर ऐसा कुछ होता तो सलमान रुश्दी को जयपुर आने दिया जाता और एक ऐसा खुशनुमा माहौल तैयार किया जाता, जिसमें कि वह अपना वक्तव्य रख सकते।
सच्चाई तो यह है हम एक बेहद खराब दौर से गुजर रहे हैं, जहां न तो वैचारिक स्वतंत्रता है और न ही कुछ करने की आजादी। रुश्दी को जयपुर न आने देने के विरोध में चार लेखकों ने प्रतिबंधित द सेटेनिक वर्सेस के कुछ उद्धरण पढ़े, उन पर आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं, यह शर्मनाक घटना है। साहित्य एक ऐसी पवित्र विधा है, जो कभी किसी की भावनाओं को आहत नहीं कर सकती। हाल के दिनों में इस तरह की कई घटनाएं हुई हैं, जिससे भारत की सहिष्णुता की छवि प्रभावित हुई है। हमारा देश आदिकाल से गंभीर और सहिष्णु माना जाता रहा है, लेकिन तस्लीमा नसरीन, सलमान रुश्दी या एम एफ हुसैन के साथ जो कुछ भी हुआ है, उसके लिए हमारा समाज और हमारी राजनीतिक व्यवस्था ही उत्तरदायी है। मुट्ठी भर लोगों द्वारा विरोध प्रदर्शन करने के बाद तस्लीमा नसरीन को कोलकाता से खदेड़ दिया गया, वहीं भारत से दूर त्रासद जीवन जी रहे, एम एफ हुसैन ने अपनी अंतिम सांस लंदन में ली। यही सब सलमान रुश्दी के साथ हुआ है।

मैं लंबे समय आम जन-जीवन से जुड़ा हुआ। मैने आम आदमी के साथ अपना सरोकार रखा है। मुङो बेहतर पता है कि भारत में संविधान लागू होने के 62 साल बीत जाने जाने के बाद भी हमारी आबादी का एक बड़ा तबका आजादी और गणतंत्र का मतलब नहीं समझता। यह हमारी विफलता है कि 62 साल बाद भी गणतंत्र का उत्सव देश के आम आदमी तक नहीं पहुंच सका है। समाजवाद हमारे समाज का एक महत्वपूर्ण मूल्य है। लेकिन लगता है कि समाजवाद को देश के राजनीतिक दलों ने पूरी तरह से भुला दिया है। यहां तक कि जो पार्टियां खुद के समाजवादी होने का दंभ भरती हैं, उनका भी समाजवाद से कोई लेना-देना नहीं रह गया है। आजादी के आंदोलन के दौरान ही यह साफ हो गया था कि भारत में समाजवादी सत्ता की स्थापना होगी।

आजादी के समय डॉ. राधाकृष्णन ने कहा था कि जब हम आजाद हो रहे हैं, तो हमारे राष्ट्रीय चरित्र में जो खामियां थीं, उन्हें हमें सुधारना होगा। हमारी खामियां हैं चरित्र की, तानाशाही की, असहिष्णुता की, अंधविश्वास की और संकुचित मनोवृत्ति की। हमें विकास के लिए शिक्षा, धैर्य, एक-दूसरे के विचारों के सहने व समझने की वृत्ति आवश्यक है। जब हम इन गुणों को अर्जित करेंगे, तभी हमारा देश विकास के राजपथ पर चल सकेगा। लेकिन अब लगता है कि हमारे देश के पहले की और वर्तमान सरकारों ने राधाकृष्णन सरीखे राष्ट्र निर्माताओं की चेतावनियों की उपेक्षा की। यही वजह है कि हम संविधान और संविधान निर्माताओं की अपेक्षा के अनुकूल नहीं बन सके। संविधान द्वारा स्थापित तमाम मूल्यों की अवहेलना पूरे देश में हो रही है। संविधान के अनुसार हमने अपने देश को प्रजातांत्रिक स्वरूप दिया है।

प्रजातांत्रिक व्यवस्था में शासन का संचालन राजनीतिक पार्टियां करती हैं, लेकिन हमारे देश में राजनीतिक दलों की जो स्थिति है, उसमें कहा जा सकता है कि उनके हाथ में प्रजातंत्र सुरक्षित नहीं है। इन राजनीतिक दलों की सबसे बड़ी खामी है कि इनमें आंतरिक प्रजातंत्र नहीं है, तो वे देश में प्रजातंत्र की परिकल्पना को कैसे साकार कर सकते हैं। देश में लोकतंत्र कहने भर को है, लेकिन वास्तव में देश की राजनीति में आम आदमी की भूमिका शून्य है।

आम आदमी इतना असहाय हो गया है कि वह चाहे या न चाहे, सरकारें बन ही जाती हैं और नेतागण अपना पेट भरने के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं। कानून व्यवस्था की हालत इतनी अधिक खराब है कि इस संबंध में तो चर्चा करना ही समय की बर्बादी माना जाने लगा है, लेकिन इसका खामियाजा हम सभी भुगत रहे हैं।

संविधान का एक और मूल्य है धर्म निरपेक्षता। हाल के दिनों में हमने धर्म निरपेक्षता को पूरी तरह से तिलांजलि दे दी है। धर्म निरपेक्षता के विरोधी इस मूल्य के को कमजोर करने में लगे, वहीं, संविधान के इस मूल्य का समर्थन करने वाले लोग मौनव्रत धारण किए हुए हैं। सांप्रदायिक दंगे धर्मनिरपेक्षता का नींव हिलाते रहे हैं। भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है। देश में लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन हो रहा है। देश की अधिसंख्य आबादी अब मानने लगी है कि भारत का प्रशासन अब चरित्रवान व्यक्तियों के हाथ में नहीं है।

राजनीतिक दलों को और समाज के अगुवा लोगों को एक साथ बैठकर इस बात पर विचार करना चाहिए कि गणतंत्र दिवस मनाया जाना कितना प्रासंगिक रह गया है। जब तक इस देश की राजनीति को इसकी मिट्टी से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता है।

संतोष मिश्र से बातचीत पर आधारित

बुधवार, 25 जनवरी 2012

जाति और डेरों का लोकतंत्र

यह जानकार हैरानी होती है कि पंजाब के ज्यादातर राजनेता चुनावी वैतरणी पार करने के लिए डेराओं के चक्कर लगा रहे हैं। सबसे ज्यादा भीड़ डेरा सच्चा सौदा के बाबा गुरमीत राम रहीम के यहां हो रही है। हाल ही में कांग्रेस की नेता प्रणीत कौर और रनिंदर सिंह ने बाबा से मुलाकात की है। बाबा के प्रमुख लोगों की समिति पंजाब विधानसभा के चुनावों में अपनी भूमिका तय करने के लिए बैठक कर रहे हैं और जसा कि संकेत मिले हैं कि उनके असर को देखते हुए वे आगामी 30 तारीख को किंगमेकर की भूमिका निभा सकते हैं। पंजाब में बाबा के पचास लाख अनुयायी बताए जाते हैं और उनका राज्य की 117 में से 55 विधानसभा पर जोर और अन्य 30 सीटों पर असर बताया जाता है। इनमें कई क्षेत्र राज्य के 67 सीटों वाले मालवा क्षेत्र में पड़ते हैं।
पंजाब से सटे हरियाणा के सिरसा में डेरा सच्चा सौदा का आश्रम चलाने वाले बाबा राम रहीम वही हैं जिन पर अपनी दो शिष्याओं के साथ बलात्कार और अन्य आपराधिक मामले हैं और उनकी भूमिका पर पारंपरिक और अनुदार सिख पंथ को कड़ी आपत्तियां हैं जिसके चलते दंगे वगैरह भी हो चुके हैं। शायद इसीलिए उम्मीद की जा रही है कि इस बार भी डेरा सच्चा सौदा के लोग शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के हितों की रक्षा करने वाले शिरोमणि अकाली दल को उसी तरह से धक्का देंगे जसा उन्होंने 2007 के चुनावों में दिया था। यानी उनका झुकाव कांग्रेस की तरफ हो सकता है और हो सकता है जल्दी ही इस बारे में कोई परोक्ष या प्रत्यक्ष बयान भी आ जाए। यही स्थिति पंजाब के अन्य डेरों की भी है। पंजाब के तमाम डेरों में राजनीतिक दलों की भीड़ बढ़ती जा रही है। डेरा सच्चा सौदा ही नहीं संत रविदास के आदर्शो पर बना डेरा सचखंड, आशुतोष महराज का दिव्य ज्योति संस्थान , रोपड़ का बाबा भनियारेवाला और अन्य डेरों में राजनीतिक दल समर्थन मांगने और उनके मुद्दों को महत्व देने के लिए दौड़ रहे हैं। निरंकारियों का अपना दायरा है। यानी मध्ययुगीन डेरों के आगे आधुनिक राजसत्ता नतमस्तक हो रही है ताकि वह अपने लिए पर्याप्त ताकत बटोर सके।
दरअसल आधुनिक लोकतंत्र जिन दबाव समूहों के संगठनों के माध्यम से अपने को चलाना चाहता था उसका कोई आधुनिक स्वरूप विकसित करने में वह विफल रहा है। यही वजह है कि राजनीतिक दलों के ट्रेड यूनियनों और कर्मचारी संगठनों या किसान संगठनों के पास जाने की खबरें कम आती हैं। या तो डेरा में माथा टेकने की खबरें आती हैं या गुरुद्वारों में। उसी तरह से उत्तर प्रदेश की पार्टियां विभिन्न जातिगत संगठनों के पास दौड़ती नजर आती हैं। उत्तर प्रदेश में जाति और धर्म के संगठन हैं जरूर पर उतने व्यवस्थित नहीं हैं जितने पंजाब वगैरह में। यही वजह है कि वहां राजनीति करने के लिए कई जाति के संगठन खड़े किए गए हैं। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि वहां जातिविरोधी आंदोलन लगातार उतना शक्तिशाली नहीं रहा जितना पंजाब और देश के अन्य हिस्सों में। आज जब उसका बहुजन समाज पार्टी के माध्यम से उसका एक आक्रामक राजनीतिक स्वरूप उभरा है तो वह अपने को सामाजिक स्तर पर भी गोलबंद कर रहा है।
ऊपरी तौर पर देखने से लगता है कि पंजाब के भीतर राजनीति ने धर्म के साथ घालमेल किया है और वहां चाहे अकाली दल हो या कांग्रेस दोनों धर्मनिरपेक्ष राजनीति के मूल्यों को मुंह चिढ़ा रहे हैं। अकाली दल की राजनीति को कभी धर्म और उसके संस्थानों से अलग हो ही नहीं पाई लेकिन कांग्रेस की भी मजबूरी उन्हीं धार्मिक संस्थानों के भीतर राजनीति करने की है जिनकोवह अपने सिद्धांत के विरुद्ध मानती है। तो क्या मान लिया जाए कि 62 गणतंत्र दिवस और 65 स्वाधीनता दिवस देखने के बाद वह वैसी नहीं हो सकी है जसी उससे अपेक्षा थी? भारतीय राजनीति की इन्हीं आशंकाओं को संविधान निर्माता डा भीमराव आंबेडकर ने अपने ढंग से व्यक्त किया था। उनका कहना था कि अगर समाज में समानता नहीं होगी तो इस लोकतंत्र में तमाम तरह की विकृतियां पैदा होंगी और संविधान का बार-बार उल्लंघन होगा।
चाहे पंजाब के डेरे हों या उत्तर प्रदेश के जाति संगठन या कर्नाटक के लिंगायत मठ उन सब की भूमिका इसलिए बढ़ी है क्योंकि समाज में असमानता बरकरार है और राजनीतिक दल उसे दूर करने में उस गति से सफल नहीं हो पा रहे हैं जसे होना चाहिए। पंजाब के डेरे एक तरह से गुरुद्वारों पर काबिज जाट सिखों के वर्चस्व के विरुद्ध एक चुनौती हैं। बाबा राम रहीम के ज्यादातर अनुयायी दलित और छोटी जातियों से संबंधित हैं। इन जातियों ने कभी कांग्रेस के साथ अपना गठजोड़ बनाया था लेकिन उनसे अपेक्षा पूरी न होते देख अपने धार्मिक और सामाजिक संगठनों को मजबूत करने पर जोर दिया। यह विडंबना है कि जिस हिंदू धर्म की जातिगत असमानता और अन्य बुराइयों से ऊब कर सिख धर्म निकला था वह अपने उन आदर्शो पर खरा नहीं उतरा। पंजाब के गुरुद्वारों में दलित सिखों को वह सम्मान नहीं मिलता जिसकी उन्हें अपेक्षा रहती है। यही कारण है कि उन्होंने अपने डेरों के माध्यम से जातिगत वर्चस्व को चुनौती दी है और आज भी वे आदि धरम, रविदासी और रामदासी जसे तमाम समुदायों से अपनी पहचान बनाते हैं। मालवा में सिख धर्म को दलितों(चमारों) ने बड़ी संख्या में अपनाया था। जबकि दोआबा के दलितों ने वैसा नहीं किया। उधर माझा इलाके में रामदासी और रविदासी समुदायों का जोर है। असमानता और उपेक्षा से उत्पन्न उनकी पीड़ा है और उसके खिलाफ नाराजगी व्यक्त करने के अपने तरीके हैं। इसी नाराजगी को व्यक्त होने और बराबरी आने से रोकने के लिए सवर्ण समाज भी धर्म का ही सहारा लेता है। अगर उत्तर प्रदेश में दलितों और पिछड़ों के उभार के समय भाजपा ने मंदिर आंदोलन चलाकर उन्हें रोकना चाहा तो पंजाब में अकाली और पारंपरिक तौर पर अनुदार सिख डेरों के खिलाफ आक्रामक होते रहते हैं।
लेकिन डेरों ने समाज के महज असमानता के खिलाफ पंथीय गोलबंदी ही नहीं की है बल्कि समाज की अन्य बुराइयों के खिलाफ भी आवाज उठाई है। आज पंजाब के 40 से 60 प्रतिशत युवक नशे के शिकार हैं। अक्सर डेरों में घरों की महिलाएं रोती हुई यह अपील करने पहुंचती हैं कि उनके बेटे या पति को नशे से बचाया जाए। डेरे वाले नशे से बचने की अपील जारी भी करते हैं। पंजाब की दूसरी बड़ी समस्या जमीन का क्षरण है। वहां की मिट्टी की उर्वरता न सिर्फ खोती जा रही है बल्कि कई इलाकों का पानी जहरीला होता जा रहा है। नदियों की दशा बहुत खराब है। उमें्र दत्त जसे लोगों की अगुआई में खेती बिरासत मिशन इस दशा को सुधारने के लिए प्रयासरत है।
जाहिर सी बात है कि पूंजीवाद के साथ मिलकर चलने वाले राजनीतिक दलों ने सत्ता हासिल करने और शासन चलाने के लक्ष्य पर अपने को कें्िरत किया लेकिन वे सामाजिक बदलाव और पर्यावरण जसे मुद्दो को छोड़ रखा है। डेरे वाले उसी खाली जमीन को भर रहे हैं। अब कोई उन्हें धर्म में राजनीति का घालमेल कहे तो कहता रहे। भारतीय राजनीति की विविधता का यही रंग है।

अरुण कुमार त्रिपाठी

रविवार, 25 दिसम्बर 2011

लालू के लोकतंत्र की हंसी

अरुण कुमार त्रिपाठी

गुरुवार को लोकसभा में लोकपाल विधेयक पेश किए जाते समय लालू प्रसाद के भाषण के समय उठती हंसी को देख और सुनकर रघुवीर सहाय की ‘हंसो, हंसो, जल्दी हंसो कविता याद आ गई। करीब साढ़े तीन दशक पहले लिखी गई यह कविता नेताओं की भ्रष्ट और क्रूर होती जमात पर व्यंग्य है। वह कहती है-
लोकतंत्र का अंतिम क्षण है कह कर आप हंसे
निर्धन जनता का शोषण है, कह कर आप हंसे,
आप सभी हैं भ्रष्टाचारी, कह कर आप हंसे,
चारों ओर बड़ी लाचारी, कह कर आप हंसे,
कितने आप सुरक्षित होंगे कह कर आप हंसे
जाहिर है सामाजिक, धार्मिक टकराव से थककर वर्गीय टकराव की तरफ बढ़ते और पूंजीवाद के वैश्विक संकट का राष्ट्रीय समाधान निकालने में नाकाम होते लोकतंत्र में तेजी से पसरती उदासी के बीच राजद नेता लालू प्रसाद की हंसोड़ शैली का थोड़ा बहुत विनोद सभी को अच्छा ही लगता है। लालू इस शैली में माहिर हैं और उन्होंने सभी का ध्यान भी खींचा और खूब मनोविनोद किया। लेकिन क्या लालू प्रसाद के व्याख्यान को महज मनोविनोद की शैली में रखा जा सकता है? लोगों का कहना है कि गुरुवार के भाषण से लालू छा गए। राजनीतिक पृष्ठभूमि में जा चुके लालू प्रसाद इस तरह के अवसर ढूंढते रहते हैं और उनके लिए यह एक मौका था जिसमें वे चर्चा में भी आएं और कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी के प्रति इतनी वफादारी जाहिर करें कि देर सबेर उसी तरह मंत्री पद मिल जाए जिस तरह अजित सिंह को प्राप्त हो जाए। लेकिन उनके मनोविनोदी भाषण में कुछ एेसे विचार भी व्यक्त किए गए जो उनके अपने ही नहीं थे। उन के पीछे कहीं कांग्रेस की मौन स्वीकृति थी और कांग्रेस की ही क्यों तमाम राजनीतिक दलों को अपनी बात लग रही थी। वरना क्या वजह है कि छोटी-छोटी बात पर विरोध और हंगामा खड़ा करने वाले सांसद लालू की बात का मजा लेने के साथ कहीं अंदर से तादात्म्य भी कायम करते लगे। हालांकि लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव इससे पहले भी कई मौकों पर एकजुट रहे हैं, लेकिन इस बार तो लालू प्रसाद ने अपनी एकता शिवसेना जसी पार्टी के साथ भी कायम कर ली।
दरअसल लालू प्रसाद की बात पर हंसने और मजा लेने वाले सांसदों को देखकर यही लग रहा था कि भारतीय राजनीति में विचारों का अंत भले न हुआ हो लेकिन विचार शून्यता तो आ ही गई है। आखिर ऐसा क्या हो गया कि जो लालू प्रसाद डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय तक भारतीय राजनीति और समाज में होने वाले क्रांतिकारी परिवर्तन के नायक जसे दिखते थे वे आज मसखरे हो गए? उसी तरह धर्मनिरपेक्षता के दुघर्ष योद्धा के तौर पर उभरे मुलायम सिंह को क्या हो गया कि वे समाजवादी सिद्धांतों के आधार पर कोई नई पहल करने के बजाय अक्सर लालू और शरद के साथ संकीर्ण गठजोड़ ही बनाने की फिराक में रहते हैं?
बहुत संभव है कि लालू, मुलायम और शरद यादव पूरी ईमानदारी से यह महसूस करते हों कि लोकपाल जसी संस्था का बनना हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भस्मासुर साबित होगा। इसके पीछे विकें्रीकरण के सिद्धांत की मान्यता और लोकतंत्र के प्रति सदिच्छा भी हो सकती है। लेकिन वह सदिच्छा तब कहां चली जाती है जब लोकपाल में आरक्षण के प्रावधान का सवाल आता है। यानी वैसे तो लोकपाल बुरा है लेकिन बन रहा है तो उसमें आरक्षण भी कर दिया जाए। जो लोकपाल वैसे ही बुरा है वह आरक्षण की व्यवस्था के बाद कैसे अच्छा हो जाएगा यह बात समझ से परे है। दरअसल राजनीति के सारे कार्यक्रम किसी सिद्धांत के बजाय महज स्वार्थ और साजिश के आधार पर गढ़े जा रहे हैं। यही वजह है कि समय-समय पर अच्छी भूमिका भी निभाने वाले यह तीनों पिछड़े नेता अब गाढ़े मौकों पर फच्चर फंसाते दिखते हैं। फच्चर फंसाना भी उतना बुरा नहीं है जितना उससे आगे का रास्ता न दिखाना। अगर उनकी समाज और प्रशासन को बेहतर बनाने के बारे में कोई सोच है तो उसे प्रकट करते हुए आगे आना चाहिए। लेकिन सोच और विचार से ज्यादा उनकी राजनीति पर महत्वाकांक्षा और साजिश का सिद्धात हावी है। उन्हें लगता है कि वे देश के प्रधानमंत्री बनने ही वाले हैं और लोग उन्हें रोकने की साजिश करने में लगे हैं। उन्होंने सामाजिक परिवर्तन के बारे में सीमित सक्रियता दिखाने के बाद राजनीतिक यथास्थितिवाद को अपना लिया। रही कांग्रेस की बात तो आजादी के बाद वह देश के राजनीतिक और सामाजिक ढांचे में स्वत: बदलाव करने से भागती रही है। वह एक यथास्थितिवादी पार्टी रही है जो समाज में उठने वाले तमाम व्रिोहों को अपने भीतर आत्मसात करने के जुगाड़ में रही है। इसी को राजनीतिशाी रजनी कोठारी कांग्रेस प्रणाली की संज्ञा देते रहे हैं। लेकिन पिछले बीस सालों में उसकी धुरी आर्थिक और दक्षिणपंथी हो गई है और यही कारण है कि राजनीति के नए ध्रुव ही नहीं मध्यमार्ग पर भी लौटने में उसे मुश्किल हो रही है। वह जाति की सच्चाई को पकड़ नहीं पा रही है उदारीकरण के मोह को छोड़ नही पा रही है।
संघ परिवार और उससे जुड़ी भारतीय जनता पार्टी अपने माफिक राजनीतिक बदलाव तो चाहती रही है, लेकिन सामाजिक स्तर पर महज हिंदू और मु्स्लिम संबंधों में तब्दीली की हिमायती रही है। वह मूल रूप से एक अनुदार पार्टी है जो कांग्रेस के विपरीत सामाजिक बदलावों को सांप्रदायिक प्रतिक्रिया के साथ अपनाती रही है। रही कम्युनिस्टों की वैचारिक चेतना की बात तो पश्चिम बंगाल का चुनाव हारने के बाद उनकी जमात में बौद्धिक सन्नाटा छाया हुआ है। उन्हें इंतजार है इतिहास के करवट लेने का।
लड़खड़ाते उदारीकरण और ध्वस्त समाजवाद के बीच भारतीय राजनीति वैचारिक जड़ता की शिकार हो चुकी है। इस जड़ता को थोड़ा बहुत अन्ना हजारे और उनके साथियों ने तोड़ने की कोशिश की है, लेकिन उनकी भी सारी कोशिश संस्थावादी एनजीओ मानसिकता में अटक गई है। आंदोलन में शामिल लोग वैेचारिक आंदोलन चला पाने की स्थिति में नहीं हैं। वे सूचना के अधिकार और सरकार की तरफ से दिए गए सामाजिक कार्यो को संपन्न कर पैसा कमाने के माहिर लगते हैं। उन्हें तिरंगे के राष्ट्रवाद और लोगों की भ्रष्टाचार विरोधी भावनाओं को छूना तो आता है लेकिन उनमें वह क्षमता नहीं है कि लोहिया और जेपी की तरह व्यवस्था के आर्थिक और राजनीतिक पहलुओं का वैकल्पिक विमर्श प्रस्तुत कर सकें। उसके लिए हमें भारतीय समाज के बदले हुए चरित्र पर अमेरिकी सर्वेक्षण एजेंसियों और क्रूर राजनीतिक हितों से दूर हटकर और ऊपर उठ कर विचार करना होगा। तरक्की के ढेर सारे दावों के बावजूद भारतीय समाज मौजूदा आर्थिक ढांचे से सहज नहीं है, लेकिन उसके सामने कोई नया स्वरूप है भी नहीं। हमारी राजनीति पद और पैसे की भूलभुलैया में भटक गई है। उसमें मजा तो बहुत है लेकिन रोशनी और हवा के लिए कोई खिड़की और रोशनदान नहीं है। एेसे में उसके पास लालू के प्रहसन पर हंसने के अलावा कोई ‘चारा नहीं है।

मंगलवार, 20 दिसम्बर 2011

हमारे तीन नायक

दिलीप कुमार, राजकपूर और देव आनंद के रूप में जो हरदिल अजीज त्रिमूर्ति थी उसमें देव आनंद के जाने के बाद अब दिलीप ही हमारे बीच हैं। पर इन तीनों ने मिलकर रुपहले पर्दे पर जो जादू बिखेरा उसका असर हमेशा बना रहेगा।

राजकपूर का जब निधन हुआ तब एक अखबार में उन पर कई लेखों के साथ राजू भारतन का एक लेख राज-देव-दिलीप की त्रिमूर्ति पर था। लेख छोटा था, उसमें उन्होंने बताया था कि किस तरह इन तीनों ने हिंदी फिल्मों का कायाकल्प किया। कहानी, गीत-संगीत, संवाद अदायगी से लेकर पूरा कलेवर, और व्याकरण बदल दिया। उनका कहना था कि आपस में और दूसरे कलाकारों से तुलना में हमेशा मतभेद की गुंजाइश रहती है पर इन तीनों के काम को जोड़कर देखा जाये तो उनका योगदान अतुलनीय हे। ठीक-ठीक शब्द तो याद नहीं पर वह लेख खत्म इन शब्दों से होता था कि सुपर स्टार और महानायक आते-जाते रहेंगे पर यह तिकड़ी हमेशा कायम रहेगी।

इसी दौरान ‘जी मैगजीन ने एक पूरा अंक इन्हीं तीनों पर केंद्रित निकाला। सुनीलदत्त, शम्मीकपूर, शशिकपूर, धर्मेन्द्र, मनोजकुमार से लेकर जितेंद्र तक सबकी राय दिलीप-राज-देव के बारे में ली गयी सभी ने उन्हें अपना आदर्श माना और उनके काम को अविस्मरणीय कहा। नये-नये टीवी चैनलों में से किसी एक पर किसी समारोह के दौरान उपस्थिति फिल्मी हस्तियों से, जिनमें निर्माता, निर्देशक, संगीतकार, अभिनेता-अभिनेत्री शामिल था पूछा जा रहा था सबसे बड़ा रोमांटिक कौन? उसमें होड़ दिलीप-देव में नजर आयी और ज्यादातर ने देव आनंद को अल्टीमेट कहा यह रेखांकित करते हुए कि गानों में उनका यह तत्व सबसे उभार पर नजर आता है। देव को श्रद्धांजलि देते हुए दिलीप कुमार ने भी कहा कि रोमांटिक सीनों में वह हम तीनों में सबसे बेहतरीन था।
तीनों के बीच उम्र में एक-एक साल का अंतर था, दिलीप फिर देव फिर राज। इनकी पहली फिल्में भी इसी क्रम से आयीं-नदिया के पार (दिलीप), हम एक हैं (देव आनंद) और नील कमल (राज कपूर)। 1994 से यह सिलसिला शुरू हुआ और ताज्जुब यह है कि 1949 आते-आते तीनों जसे आगे तस्वीर बदलने के लिए तैयार हो गए। 1949 में ही राजकपूर-दिलीपकुमार-नरगिस की महबूब खां निर्मित प्रेम त्रिकोणीय फिल्म ‘अंदाज आयी थी। दिलीप तो अभिनय में मंज ही चुके थे पर राजकपूर की एक्टिंग भी लाजवाब थी, खासकर उन दृश्यों में जहां वे दिलीप कुमार का सामना कर रहे होते थे। दिलीप कुमार के अभिनय की बात करें तो बलराज साहनी जसे अभिनेता की बात याद आती है। इसी के आसपास एक और प्रेम त्रिकोण वाली फिल्म आयी थी, ‘हलचल। वामपंथी राजनीति के कारण बलराज जेल में थे और शूटिंग के लिए पुलिस के पहरे में आते थे। अपनी फिल्मी आत्मकथा में उन्होंने लिखा कि मैं देखता कि शूटिंग के पहले दिलीप और नरगिस मजे से बातें करते रहते और शूटिंग शुरू होते ही दिलीप तो जसे अपने पात्र में प्रवेश कर जाते जबकि कैमरे के सामने मेरा चेहरा मुङो पत्थर सा वजनी लगता। एक दिन मैंने दिलीप से पूछ ही लिया, यार तुम ऐसा कैसे कर लेते हो। दिलीप कुमार ने जो जवाब दिया वह बलराज साहनी को बेहद नागवार गुजरा। उन्होंने कुछ ऐसा कहा था कि भगवान की कृपा है और कुछ दोस्तों्र की मेहरबानी।
1949 ही वह वक्त था जब बाम्बे टॉकीज की, जिसके सर्वेसर्वा उन दिनों अशोक कुमार थे फिल्म ‘जिद्दी में देव आनंद को सफलता का स्वाद मिल चुका था और उन्होंने अपनी कंपनी बना ली थी जिसको चेतन आनंद ने नाम दिया ‘नवकेतन। खुद राजकपूर ने अपनी फिल्में इसी के आसपास शुरू कीं। इसी समय से जसे तीनों अपनी तरह की फिल्मों के लिये जुट गए और इसके लिए बेहतरीन दिमागों को अपने लिये जुटाने लगे। दिलीप तलत मुकेश से होते हुए रफी तक पहुंचे। ‘अंदाज से मजरूह को छोड़ नौशाद शकील से जुड़े और उन्होंेने मिलकर दिलीप की छवि को अपने गीत-संगीत से घनीभूत किया। वहीं राज ने ख्वाजाअहमद अब्बास, शंकर जयकिशन, शैलेंद्र-हसरत और मुकेश-मन्नाडे से अपनी फिल्मों को नई ऊंचाइयां दीं। देव आनंद का मामला कुछ अलग था। उनके यहां प्रतिभाओं का आना-जाना लगा रहा। चेतन, गुरुदत्त, राज खोसला के बाद उन्हें ‘गाइड के रूप में छोटे भाई गोल्डी विजय आनंद मिले। साहिर, मजरूह, शैलेंद्र, हसरत, नीरज सबने देवमार्का बेजोड़ गाने लिखे और धुरी सचिनदेव बर्मन रहे पर दूसरे संगीतकारों के साथ भी उनका साथ निभा। रफी-किशोर-हेमंत उनके प्रिय गायक रहे पर शायद महेंद्र कपूर को छोड़ उन्होंने उस दौर के सभी गायकों को आवाजें लीं।
‘मुगले आजम में शहजादा सलीम के रूप में दिलीप कुमार ने जिस अंदाज से संवाद अदायगी की वह एक ऐतिहासिक मोड़ की तरह थी जहां अकबर यानी पृथ्वीराज कपूर की संवाद अदायगी की पुरानी शैली विदा हो रही थी। ‘बाजी से देव आनंद और ‘आवारा से राजकपूर फिल्म कथाओं की विषय-वस्तु बदलनी शुरू कर दी। फिर इसके बाद पूरी फिल्मी दुनिया ही बदल गयी। प्रेम की तीन धाराएं चल निकलीं। दर्शकों के तीन वर्ग बन गए। और दिलीप-देव-राज की तूती बोलने लगी। अमिताभ से एक बार पूछा गया कि उनके अभिनय में दिलीप की छाया दिखती है तो पलटकर उन्होंने पूछा कि कौन है जिसमें नहीं दिखती, ‘आदमी फिल्म में तो गजब यह हुआ कि ऐन दिलीप कुमार के सामने मनोज कुमार उनकी ही एक्टिंग कर रहे थे। राज कपूर ने जरूर अपने लिए ‘आवाराज् की एक ऐसी छवि गढ़ी जिसे फिर कोई नहीं अपना पाया। पर उस जमाने में कौन बेहतर एक्टर है इस पर मुकाबले में दिलीप और राज कपूर ही रहते थे। इन दोनों से अलग देव आनंद ने अपनी छवि शहरी प्रेमी की बनायी। खास बात यह है कि ‘एंटी हीरो का जो क्रेज इन दिनों है देव उसे ‘बाजी से लगातार करते रहे। अपने दो महान समकालीनों से अलग उन्होंने जो अपनी रूमानी छवि बनायी वह जादू की तरह असरकारी हुई और ‘हीरो शब्द के तिलिस्म के सबसे करीब वही रहे। खास बात यह भी कि देव आनंद की फिल्मों के गाने लोकप्रियता में बेमिसाल रहे और इसमें भी उन्होंने दोनों पीछे छोड़ दिया। शायद किसी एक अभिनेता पर सबसे ज्यादा सुरीले और लोकप्रिय गाने उन्हीं के पास हैं। शम्मी कपूर के गाने भी बेजोड़ रहे हैं। एक बार उन्होंने स्वीकार किया था कि गीतों पर होंठ संचालन के लिए उन्हें देव साब से ही प्रेरणा मिली।
इन तीनों की लोकप्रियता कालातीत रही। जवाहरलाल नेहरू ने एक बार कहा था कि इस देश में लोग दो ही लोगों की बात सुनते हैं, मेरी और दिलीप कुमार की। राज कपूर ‘शो मैन कहलाये और उनके मुकाबले में जब बाद में सुभाष घई को ‘शो मैन कहा जाने लगा तो वे खुद इससे शर्माते से रहे। दर्शकों की कई पीढ़ी ही नहीं अभिनेताओं की कई पीढ़ी इनकी दीवानी रही। धर्मेन्द्र आज भी बटुए में दिलीप कुमार की फोटो रखते हैं और दिल में तीनों की। राजेश खन्ना देव आनंद को आदर्श और प्रेरणादायी मानते हैं और ताज्जुब करते हैं कि 1970 में जब उनकी ‘दो रास्ते, ‘बंधन, ‘सच्चा झूठा खूब चली थी तो उनसे ज्यादा धूम ‘जानी मेरा नाम की थी।
आपस में तीनों के रिश्ते दोस्ताना थे। राज और दिलीप ज्यादा घनिष्ठ थे पर देव से दोनों की यारी थी। देव ने एक इंटरव्यू में कहा कि ‘युसूफ जब तक सुहागरात के लिए कमरे में नहीं चला गया, तब तक मैं उसकी शादी में मौजूद रहा, तीनों में स्वस्थ स्पर्धा थी। फिल्में और उनकी अपनी शैली इतनी अलग थी कि उस पर कोई झगड़ा संभव नहीं, पर फिल्मी दुनिया में उनकी अपनी फालोइंग थी। अपने-अपने कैम्प थे। एक दूसरे के काम के प्रति सम्मान था। नेहरू-युग में तीनों अपने-अपने ढंग से उसे फिल्मों में रंग देते रहे और बाहर समाज में उस दौर में इकट्ठे दिखते थे। कृष्ण मेनन और कृपलानी के चुनाव में मेनन के साथ तीनों थे और प्रचार में उनकी फोटो भी छपती थी। पर फिल्मी दुनिया जसी जटिल और मतलबी दुनिया में संबंधों में उतार-चढ़ाव आते ही हैं। इनके साथ भी यही हुआ। देव को बुरा लगा जब जीनत राज के कैम्प में चली गईं और ‘मेरा नाम जोकर जसी महत्वाकांक्षी फिल्म के पिटने का एक कारण राज ने उसी समय आयी ‘जानी मेरा नाम को माना। फिर जब राज ने ‘बॉबी बनायी तो लोगों ने इसे ‘राज का दर्शकों से बदला कहा।
राज कुछ जल्दी चले गए। दिलीप-देव के संबंधों के बारे में कई बातें उड़ती रहीं। किसी भी फिल्मी समारोह में एक होता तो दूसरा नहीं। राज कपूर पर जब डाक टिकट जारी हुआ तब दोनों आए और एक अंग्रेजी अखबार ने इसे नोट करते हुए कैप्शन में लिखा अर्से बाद दोनों साथ दिखायी दिये। कहा तो यह भी गया कि देव को दादा साहब फाल्के सम्मान के लिए कमेटी में दिलीप ने उनका विरोध किया। देव आनंद इस हिसाब से ज्यादा साफ-सुथरे थे कि उन्होंने कोई गलत टिप्पणी नहीं की और अंत तक जब भी मौका आया दिलीप और राज की भूरि-भूरि प्रशंसा की। दिलीप-राज जरूर बाद के वर्षो में उनका नाम लेने से कतराते रहे। देव आनंद के निधन के बाद भी कलकत्ते के एक अखबार की खबर ने संबंधों में कुछ काला होने के संकेत दिये। मृत्यु से चार घंटे पहले देव आनंद ने लंदन से फोन पर अपने सचिव मोहन को कहा कि अगर मैं लौट आया तो मैं खुद जाऊंगा नहीं तो ग्यारह दिसंबर को 89 गुलाब लेकर युसूफ के घर जाना। वह दिलीप का 89 जन्मदिन था। दिलीप देव के दुख में पार्टी नहीं करना चाहते थे पर शायद एक-दूसरे से भिड़ंत कराने वाले महाप्रेमियों के कारण वह पार्टी हुई और देव आनंद का सचिव सायरा बानू और दूसरे स्टाफ को फोन-पर-फोन करता रहा पर किसी ने सुना नहीं। इसी खबर में देव के हवाले से यह भी कहा गया था कि वे अपनी आत्मकथा का विमोचन युसूफ से कराना चाहते थे। सायरा बानू ने उनसे कहा कि वे बताएंगी पर फिर फोन भी नहीं किया। देव इस पर दुखी थे कि सौजन्यता में पलटकर फोन तो करना था। संबंधों में उलटफेर आते रहते हैं पर यह असंदिग्ध है कि मिलकर दर्शकों से जो संबंध इन्होंने बनाए वे अमिट रहने वाले हैं। ‘आवारा गया, ‘बंबई का बाबू भी गया। सौभाग्य से ‘देवदास हमारे बीच है, अपने समय की एक अविरल बहती प्रगाढ़ धारा के रूप में, जिसमें वे दोनों धाराएं भी अंत:सलिला हैं।

मनोहर नायक

मंगलवार, 6 दिसम्बर 2011

याद किया दिल ने, कहां हो तुम..

मनोहर नायक

‘गाइड में राजू यानी देवानंद की मौत हो या हों इस बारे में अलग-अलग राय थी। इस बहस में एक बार खीझकर विजय आनंद ने कहा था,‘दिलीप कुमार मर सकता है देवांनद नहीं मर सकता। जाहिर है उनका आशय फिल्मों में मरने से था लेकिन अंत में मरने पर ही फैसला हुआ और वही फिल्म देव साब की अमर फिल्म मानी गयी। फिल्मों में जो यौवन, ऊर्जा, स्टाइल, खिलंदड़ापन देवानंद लेकर आये वो बेजोड़ है और ये चीजें दरअसल उनके जीवन से उनकी फिल्मों में रूपांतरित होती रही। लगातार आगे बढ़ने का जज्बा, जीवन यानी भविष्य को लेकर उत्कट प्रेम और विश्वास, अपने में मग्न, पलटकर पीछे देखने की जिद इनसे बनते रहे देव आंनद। एक औरदेव इसी में साथ-साथ घूमते-मिलते रहे, जिसे लोग एटर्नल रोमांटिक के रूप में कहते-जानते रहे- एक दूसरेदेवज् यानीप्रेम पुजारी शोखियां, मस्ती, शराब और शबाब के शाश्वत रोमानी तत्वों से मिलकर बने। रूपहले पर्दे पर इन दो छवियों के मेल से बनी इंद्रधनुषी छवि का जादू 50-60 के दशक में सिर चढ़कर बोला और छह दशक तक लोगों को मुग्ध किये रहा। लोगों ने प्रेम से तब उन्हेंसदाबहार कहा। महानायकों के इस दौर में तीन नायकों: दिलीप कुमार, राजकपूर और देवानंद जिस तरह से हिंदी सिनेमा का कायाकल्प किया, वह अकल्पनीय है। नए- पुराने में ही नहीं समकालीनों में भी तुलना होती है। दिलीप-राज-देव के चाहने वालों में श्रेष्ठ की बहस होती ही रही है। पर तुलनाओं को एक तरफ रखें तो यह असंदग्धि रूप से कहा जा सकता है कि भारतीय सिनेमा की यह त्रिमूर्ति अजर-अमर है।

दरअसल ये प्रेम की तीन धाराएं थी। दिलीप कुमार कीदेवदास वाली धारा, राज कपूर कीआवारा वाली धारा, देवानंद कीबंबई की बाबू वाली धारा। दिलीप कुमार का बेहतरीन अभिनेता और उनकीगंगा जमुना को अभिनय की पाठ्य पुस्तक मानने वाले, राजकपूर को उम्दा निर्देशक कहने वाले, देवानंद शायद तीनों में तीसरे नंबर पर थे। कहते हैं कि उस दौर में फिल्म पत्रिकाओं में यह अलिखित सा नियम था कि इनका एक साथ जिक्र आने पर दिलीप-राज- देव का रहेगा। इसी का हवाला देते हुए जब एक बार देवांनद से पूछा गया कि इसका मतलब तो यह हुआ कि आप थर्ड बेस्ट थे, तो उन्होंने कहा था किहमारे बीच टकराव नहीं था। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा थी। ऐसे किसी नियम को मैं नहीं जानता, हम तीनों अपने-अपने काम में मग्न थे, हमारी फिल्मों का क्षेत्र बेहद अलग था, पर एक बात बिना किसी दंभ के मैं कह सकता हूं कि जब मैं अपने एलीमेंट में होता हूं, तब मुङो कोई परास्त नहीं कर सकता।

शायद देव के इसी बात में उनके लीजेंड होने का राज छिपा हुआ है। वे खुद का बेहद खराब एक्टर(फिल्मों में आने से पहले संघर्ष वाले दौर में ख्वाजा अहमद अब्बाज द्वारा लिखित नाटकजुबैदा में हीरो चेतन आंनद के छोटे भाई बने देवांनद से रिहर्सल के दौरान झल्लाकर निर्देशक बलराज साहनी ने कहा थायार देव तू कभी एक्टर नहीं बन सकता बन सकता। ) मानने वाले, बेहद सीमित अदाकारी और अदाओं वोलद देव साहब फिल्मों की निर्मम दुनिया में दौड़ में बराबर बने ही नहीं रहे, बल्कि अपने दोनों प्रतिभाशाली समकालीनों की बराबरी में दौड़ते रहे। यह ताज्जुब में डालता है। शायद 1957 में गजब ही हुआ जब फिल्म फेयर अवॉर्ड में सर्वश्रेष्ठ एक्टर के लिए तीनों के ही नाम थे तबकाला पानी के लिए देवानंद को अवॉर्ड मिला।

फिर भी इस बात पर आम सहमति रही कि तीनों में सर्वश्रेष्ठ दिलीप कुमार ही हैं। लेकिन स्टारडम देवानंद का बड़ा रहा। उनके पहनावे, चाल-ढाल, हेयर स्टाइल आदि का जितना क्रेज रहा और जिस तरह अपनाया गया, उसकी कोई मिसाल रहीं। किसी को बने-ठने देखकर यही फब्ती सुनाई देती है किबड़ा देवानंद बना फिरता है।ज् कुछ ही माह पहले हिंदूज् में दिलीप कुमार की एक टिप्पणी ने हैरत में डाला। दिलीप कुमार से जब राज-देव के बारे में पूदा गया, तो उन्होंने कहाअगर मैं लीजेंड हूं, तो वे दोनों भी लीजेंड हैं। अब आवारा में राज जबरदस्त तो गाइड में देव बेजोड़। देवानंद जसा सुंदर चेहरा इंडस्ट्री में आज तक नहीं आया।

देवानंद की खास बात इसी में है कि उन्होंने किस तरह अपनी सीमाएं पहचानी और उसे चमकाकर एक अद्वितीय पारी खेली। देवानंद के नक्कालों की सूची भी लंबी है और इसमें कमल हसन भी हैं, जिन्होंने एक बार कहा था कि उन जसा करने की कोशिश में कभी सफल नहीं हुआ। फिल्मसौदागर में सुभाष घई, विवेक मुसरान को यही टिप्स देते थे कि वैसा ही करो जसा देवानंद करते थे। इस फिल्म के एक समीक्षक ने यह बात नोट करते हुए लिखा कि विवेक युवा देवानंद की याद दिलाते हैं देवानंद का करिश्मा यही था कि उनकी छवि लोगों की स्मृति में टंक गई। दिलचस्प बात यह है कि यह पीढ़ी दर पीढ़ी हुआ।

‘सिने ब्लिट्ज पत्रिका मेंदेवी ने अपने कॉलम में तबके सुपर स्टार राजेश खन्ना को जज करते हुए लिखा किमैं वॉकर लेकर बच्चे को घुमाता फिरूं, तब भी ये जनाब हीरो बनते रहेंगे। हीरो नाम का जो जादुई शब्द है शायद देवानंद इसके सबसे करीब थे। एक अत्यंत उज्जवल छवि उन्होंने गढ़ी लगभग वैसी जसीबात एक रात कीज् के गाने में चित्रित होती है।ऐसे में कहीं प्यारे/ झील के किनारे/हंस अकेला निकले/ ऐसे ही देखो जी/ ये मनमौजी/ मौजों के सीनों पार चले/ चांद सितारों के तले।

उनके परिश्रम, लगर और मर्मपक्ष की बातें करें, तो फिरतेरे घर के सामनेज् की ये पंक्तियां दिल में बसने लगती हैं : ‘दिल में वफाएं हों, तो तूफां किनारा है। बिजली हमारे लिए प्यार का इशारा हैज् या ‘दिल में जो प्यार हो तो, आग भी फूल है। सच्ची लगन जो हो तो पर्वत भी धूल है।ज् 1944 अगस्त के एक बारिश भरे दिन में जेब में तीस रुपए लिए गुरदासपुर से लाला किशोरीमल के तीसरे नंबर के बेटे की बंबई पहुंचने और लंबा संघर्ष के बाद सफलता चूमने की यह कहानी दिलकश और रोमांचक है। छह दशक के इस सफर में तीन दशक सफलता के रहे और बाद के तीन घोर असफलता के। उकनी फिल्में एक ही दिन में थियेटर से उतरीं, पर देव की छवि धूमिल हुई और लोगों का प्रेम कम हुआ और उनका उत्साह और जीवट। विजय आनंद ने एक बार कहा था िक देव साहब जो कुछ करते हैं मैं उन्हें करने देता हूं। अमिता मलिक ने अपने कॉलम में लगभग अपील भी की कि देव जो कर रहे हैं, उन्हें करने दिया जाए। उनके अत्यंत प्रतिभाशाली दोस्त गुरुदत्त नाकामी नहीं ङोल पाए जबकि देव आगे बढ़ते रहे। अपनी शर्तो पर जाहिर है उनकी छवि कामयाब छवि थी। देव की छवि में सम्मोहन था। एक दिलकश अदा थ्ज्ञी। यह वह छवि थी जिसमें फिजा ही बदल दी। रवींद्रनाथ ने जवाहर लाल नेहरू के राजनीति में आगमन को लेकर जो कहा था उसे बदलकर हम कह सकते हैं : ‘देवानंद का फिल्मों में आना वसंत का आना था।

नवकेतन के जरिए उन्होंने अपने तरह की फिल्में बनाईं। गुरुदत्त, राज घोसला जसे कितने लोगों को सामने लाए, पर फिर देव का नहीं, उनकी फिल्मों का जादू उतरता गया। लोग उनकी उत्साह-ऊर्जा की तराीफ करते हुए भी सवाल करने लगे, ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला औरगाता रहे मेरा दिल तो ठीक है पर देवसाहबफिर ेस वह सावन अब क्यों आए पर वे दुखी हो, इसलिए कि इस बातों का अंदाज वही होता था कि देव साबहयह प्यार है पर गिला नहीं¯.

देवसाहब अपनी शर्तो पर काम करते रहे। इमरेजेंसी के खिलाफ उठकर खड़े हुए, लोगों से वादा निभाते रहे। इंडस्ट्री में सबसे शरीफ माने गए, समझौता कभी किया नहीं। हां, अपनी छवि का ख्याल रखा। अपनी फिल्मों में ज्यादा से ज्यादा सूट बूट में रहे। शांताराम को मास्टर साब जसा मानते हरे, तो कभी उनके पास फटके नहीं।इंसानियत को छोड़ दें, तो कभी और किसी बड़े कलाकर के साथ काम नहीं किया, लोगों ने आत्ममुग्ध कहा तो बोले, ‘इसी से हासिल हुआ आत्मविश्वास।

देवानंद के अनगिनत किस्से हैं, उनकीं उदारता, मददगारी के किस्से जानकी दास की किताब के पन्नो मेंदेवीज् जसों के स्तंभों तक में थे। देवी ने तो मरने से पहले देवानंद से मिलने की ख्वाहिश जताई थी। देवानंद का जाना प्रेम की दूसरी धारा का लुप्त हो जाना है। एक युग का अवसान होगा। यह एक संयोग है कि साल के शुरू में हमने अपने एक बड़े कलाकार हुसैन को खोया, जो नब्बे पार होकर भी बेहद सक्रिय और जीवन्तता से सराबोर थे और साल के अंत में उन्हीं जसे देवानंद को खोया तो अब संयोग यही है कि दोनों ने अंतिम सांसे लंदन में ली और अंतिम क्रिया भी वहीं पर हुई।

लेखक आज समाज के स्थानीय संपादक हैं.

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